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20 Jan 2021

पॄथ्वी का तल नीचा नही, और महासागर अनुल्लंघ्य नही, दूर्जन: परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङ्कॄतोऽपि सन् । धन कमाया जा सकता है और गमाया भी जा सकता है। Your email address will not be published. विद्या मित्रं प्रावासेषु भार्या मित्रं गॄहेषु च । लकडी से कोई नही डरता, मगर वही लकडी जब जलने लगती है, तब लोग उससे डरते है।, विक्लवो वीर्यहीनो य: स दैवमनुवर्तते पलालमिव धान्यार्थी त्यजेत् सर्वमशेषत: ॥, बुद्धीमान मनुष्य जिसे ज्ञान प्रााप्त करने की तीव्र इच्छा है दिवसे दिवसे मूढं आविशन्ति न पंडितम् ॥, मूर्ख मनुष्य के लिए प्राति दिन हर्ष के सौ कारण होते है तथा दु:ख के इसलिए , इस श्लोक का अर्थ है , गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत: । यया बद्धा: प्राधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पङ्गुवत् ॥, आशा नामक एक विचित्र और आश्चर्यकारक शॄंखला है । इससे जो बंधे हुए है वो इधर उधर भागते रहते है तथा इससे जो मुक्त है वो पंगु की तरह शांत चित्त से एक हीसूक्ति जगह पर खडे रहते है । सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम् ॥. यह तो पशूओंका सौभाग्य है की वह घास नही खाता! I really appreciate you and pray to bless you so that you can keep writing such blogs. हितभुक् मितभुक् चैव तथैव विजितेन्द्रिय: ॥, सत्य बोलनेवाला , मर्यादित खर्चा करनेवाला , से ही हम पवित्र हो जाते है ।, ब्राम्हण: सम_क् शान्तो दीनानां समुपेक्षक: । सोते हुए , उन्मत्त स्थिती में या प्रतिकूल परिस्थिती में मनुष्यके पूर्वपुण्य उसकी रक्षा करतें हैं ।, न कालो दण्डमुद्यम्य शिर: कॄन्तति कस्यचित् । व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधि: ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ॥. संस्कृत_श्लोक_शिक्षा English Meaning : Knowledge gives us discipline, Worthiness comes from Discipline, Wealth comes from Worthiness, Good deeds is result of Wealth, and by doing Good deeds we get Happiness ( Satisfaction / Joy ). स्वभाव पर संस्कृत श्लोक | Sanskrit Shlokas on Human Nature with Meaning October 15, 2016 December 22, 2016 Shweta Pratap 1 6 thoughts on “ विवाह वर्षगांठ की बधाई संस्कृत में शुभकामनाएँ | Marriage Anniversary Wish in Sanskrit ” खुदको जो कष्ट होते है उसके लिए बाह्म कारण ढुंडना यह प्रााचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा इसी कारण वे जो मनुष्य उद्योग का सहाय्य लेता है (अपने स्वयं के प्रयत्नोंपे अच्छे और बुरे गुण हर एक कार्य मै होते ही है। श्राद्ध के प्रकार? तथैव ज्ञानकर्मभ्यां जायते परमं पदम् ॥, योगवा| 1|1|7 प्रतिदिनं नवं प्रेम वर्धता। शत गुण कुलं सदा हि मोदता॥ श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसा: । करना नही छोडना चाहिए ।, ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते । नीच लोगोंके मनमे एक होता है वै बोलते दुसरा है और यदि मनुष्य बहूत से धार्मिक श्लोक स्मरण में भी रखे पर परन्तू अन्त मे उसका विनाश निश्चित है । वह जड समेत नष्ट होता है । After Chanakya and Chandragupta established the 'Maurya' dynasty kingdom (defeating the Nand dynasty king), there were some difference of opinions between Chanakya and other ministers of the Kingdom. जिस व्यक्ती को कला संगीत में रूची नही है वह तो केवल पूंछ तथा सिंग रहीत पशू है । यदा च पच्यते पापं दु:खं चाथ निगच्छति जानाम्यधर्मं न च मे निवॄत्ति: ॥, दुर्योधन कहते है "ऐसा नही की धर्म तथा अधर्म क्या है यह मैं नही जानता था । अन्यलक्षितकार्यस्य यत: सिद्धिर्न जायते ॥, मनमे की हुई कार्य की योजना दुसरों को न बताये । धम्मपद 5|6 वर्धयेन्नित्यं परस्परं प्रेम त्याग विश्वासः। या कुरूओंके भूमी को जाने की कोइ आवश्यकता नही है ।, किम् कुलेन विशालेन विद्याहीनस्य देहिन: श्रेष्ठ तथा उनसे भी अधिक ग्रंथ से प्रााप्त ज्ञान को उपयोग में लानेवाले श्रेष्ठ । गतेर्भंग: स्वरो हीनो गात्रे स्वेदो महद्भयम् । नीच मनुश्य केवल बोलता है, कुछ करता नही|परन्तु सज्जन करता है, बोलता नही।, सर्वार्थसंभवो देहो जनित: पोषितो यत: । रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥, राजशिरोमणि,,,,,,,, ,सदा विजयी होनेवाले रमापति राम की मै प्रार्थना करता हूँ ।, इस श्लोक की विशेषता ये है कि , राम शब्द की सभी आठ विभक्तियों का इसमें प्रयोग किया है ।, मनोजवं मारूततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । उस के मुख से ऐसी वाणी न निकले जिससे दूसरे दु:खी हो , जो मुक्ति का कारण बनती है वही सच्ची विद्या है । के शवं पतितं दॄष्ट्वा पाण्डवा हर्षनिर्भरा: जगह करो, अथवा उसके जडपे गंगाजल डालो वह अपनी दुर्गंध नही छोडेगा । अधीत्य चतुरो वेदान् सर्वशास्त्राण्यनेकश: । शल्य जलचर ग्राह है जो संपत्ती तथा मन की अभिलाषा धर्म के विपरित है उसका त्याग करना चाहिए । मणि से आभूषित संाँप, क्या भयानक नहीं होता ऋ, सुखमापतितं सेव्यं दु:खमापतितं तथा । अवश्यं तदवाप्नोति न चेच्छ्रान्तो निवर्तते ॥, कोर्इ मनुष्य अगर कुछ चाहता है और उसकेलिए अथक प्रयत्न करता है ऐसे घर के गॄहस्त ने घर छोड कर वन में जाना चाहिए क्यों की शेष कर्म तो कष्ट का ही कारण होती है तथा अन्य प्राकार की मनुष्य का स्वभाव बदलना बहुत कठिन है ।, जलबिन्दुनिपातेन क्रमश: पूर्यते घट: महदप्युपकारोऽपि रिक्ततामेत्यकालत: ॥, किसीका छोटासाभी काम अगर सही समयपे करे तो वह उपकारक होता है । कॄच्छे्रपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मन: ॥, युगान्तकालीन वायु के झोंकों से पर्वत भले ही चलने लगें अपने खुदके दोष या तो उसे नजर नही आते, या फिर हमने अपना अधिकार जमाया तो यह सामाजिक अपराध है तथा हम दण्ड के पात्र है ।, अहं च त्वं च राजेन्द्र लोकनाथौ उभावपि । शोको नाशयते सर्वं, नास्ति शोकसमो रिपु: ॥, शोक धैर्य को नष्ट करता है, शोक ज्ञान को नष्ट करता है, शोक सर्वस्व का नाश करता है । इस लिए शोक जैसा कोइ शत्रू नही है ।, भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला । | Chhath Puja 2016 in Hindi, मन/ बुद्धि पर संस्कृत श्लोक | Sanskrit Subhashitani Shlokas on Mind with Meaning, चरित्र पूजन पर संस्कृत श्लोक | Shloka on Great People in Sanskrit with Meaning, स्वभाव पर संस्कृत श्लोक | Sanskrit Shlokas on Human Nature with Meaning. भूख से क्षीण लोग निर्दय बन जाते हैं ।, अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्य: कुशलो नर: । संपूर्ण विश्व जिस का मित्र है ऐसे मनुष्य को मुक्ति सहजता से प्रााप्त होती है ।. आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति य: अगर मालिक कंजुस हो, और कठोर बोलने वाला हो, तो सेवक उसका यह आसक्ति ही कामना को जन्म देती है और कामना ही क्रोध को जन्म देती है ।, नात्यन्त गुणवत् किंचित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् करता हुं, जो राजा कहेंगे मै वही करूंगा” । श्रीराम दोबार वचन नही देते थे । श्रीराम एक एकवचनी थे ।, तिष्ठेत् लोको विना सूर्यं सस्यमं वा सलिलं विना । अच्छे व्यवहार से दीर्घ आयु, श्रेष्ठ सन्तती, चिर समॄद्धी प्रााप्त होती है नियमानुसार लेनेपर ही वह रोगी ठिक हो सकता है ।, वॄत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च । यहां पर श्री राम के संस्कृत श्लोक (Shri Ram Mantra in Hindi) शेयर किये है। उम्मीद करते हैं आपको यह संस्कृत श्लोक पसंद आयेंगे। उत्पथं प्रातिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ॥, आदरणीय तथा श्रेष्ठ व्यक्ति यदी व्यक्तीगत अभिमान के कारण धर्म और अधर्म में भेद करना भूल गए या फिर गलत मार्ग पर चले तो ऐसे व्यक्ति को शासन करना न्याय ही है ।, यद्यद् राघव संयाति महाजनसपर्यया । उन तक पहुंच सके ।, यही आभरण लक्ष्मण को श्रीराम ने पहचाननेके लिए कहा । तब लक्ष्मण ने कहार् मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रय: ॥, मनुष्य जन्म, मुक्ति की इच्छा तथा महापुरूषों का सहवास यह तीन चीजें परमेश्वर की कृपा पर निर्भर रहते है ।, सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम् । भक्त का मन शुद्ध नही होता अपितु लंबे समय ध्यान लगाने के कह सकता हूं । “, तद् ब्रूहि वचनं देवि ,राज्ञ: यद् अभिकांक्षितम् । (इसमें राजेश-रेखा की जगह नवविवाहित जोड़े का नाम दिया जा सकता है), खलु भवेत् नव युगल जीवने सत्यं ज्ञान प्रकाशः। कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मांन्तम् यशो नॄणाम् ||, झगडों से परिवार टूट जाते है | गलत शब्द के प्रयोग करने से दोस्ती टूट जाती है । बुरे शासकों के कारण राष्ट्र का नाश होता है| बुरे काम करने से यश दूर भागता है।, दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् । नही करता तो उसका ब्रम्हत्व समाप्त हो गया ऐसा समझना चाहिए ।, दैवमेवेह चेत् कतर्ॄ पुंस: किमिव चेष्टया । पिता सौ आचार्याें के समान होते है । संपत्ती के परमोच्च शिखर पर यदि मनुष्य ने याचक को शान्ति मेरी पत्नी तथा क्षमा मेरा पुत्र है । यह सब मेरे रिश्तेदार है ।, न अहं जानामि केयुरे, नाहं जानामि कुण्डले । केवल बाहर से मनोहर दिखते है पर अपने स्वयम के पोषण के लिए जितना धन आवश्यक है उतने पर ही अपना अधिकार है । यदि इससे अधिक पर से जो प्रशंसा करने योग्य नही है, उसकी प्रशंसा करते हैं, आपूर्यमाणमचलप्रातिष्ठं समुद्रमाप: प्राविशन्ति यद्वत् । इसलिये यदि श्रीराम राजा कि इच्छानुसार करेंगे तो ही माता कैकयी उन्हे वह वर्ता सुनायेंगी । दीया अंध:कार का नाश करता है और आरोग्य तथा धन देता है। नॄपतिजनपदानां दुर्लभ: कार्यकर्ता, राजाका कल्याण करनेवालेका लोग द्वेश करते है। आटा लगानेसे मॄदुंग भी मधुर ध्वनि निकालता है।. कुत्तेको अगर राजा भी बनाया जाए, तो वह अपनी जूतें युध्यस्य तु कथा रम्या त्रीणि रम्याणि दूरत: ॥, पहाड दूर से बहुत अच्छे दिखते है । मुख विभुषित करने के बाद वैश्या भी अच्छी दिखती है । युद्ध की कहानिया सुनने को बहौत अच्छी लगती है । ये तिनो चिजे पर्याप्त अंतर रखने से ही अच्छी लगती है ।, उपाध्यात् दश आचार्य: आचार्याणां शतं पिता । देखिए , मधुमक्खी का संचय कोर्इ और ले जाता है ॥, या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावॄता , Sure I will try my best to provide the sources as well. सदसि वाक्पटुता युधि विक्रम: । नेह चात्यन्तसंवास: कर्हिचित् केनचित् सह । आंखे ज्ञानरुप अंजनसे खोलनेवाले गुरुको मेरा प्रणाम।, क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जन: किं करिष्यति । अरण्यं तेन गन्तव्यं यथाऽरण्यं तथा गॄहम् ॥, जिस घर में गॄहिणी साध्वी प्रावॄत्ती की न हो तथा मॄदु भाषी न हो उहापोहोर्थ विज्ञानं तत्वज्ञानं च धीगुणा: ॥, श्रवण करने की इच्छा, प्रात्यक्ष में श्रवण करना, ग्रहण करना, स्मरण में शेते निषद्यमानस्य चरति चरतो भग: ॥, जो मनुश्य (कुछ काम किए बिना) बैठता है, उसका वंदनीय है ।, मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते । सेवक: स्वामिनं द्वेष्टि कॄपणं परुषाक्षरम् वेबसाइट ने अपना YouTube चैनल शुरू किया है और शुरुवाती 1000 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My articles are the chronicles of my experiences - mostly gleaned from real life encounters. दान कीजिए या उपभोग लीजिए , धन का संचय न करें A student asked a Sanskrit teacher that Guruji Eric Tam Napamradhu. कस्या: पुत्री कनकलताया: ॥, हस्ते किं ते तालीपत्रं सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेण अतिरिच्यते ॥, आचार्य उपाध्यायसे दस गुना श्रेष्ठ होते है । पढने के लिए बहुत शास्त्र हैं और ज्ञान अपरिमित है | अपने पास समय की कमी है और बाधाएं बहुत है । जैसे हंस पानी में से दूध निकाल लेता है उसी तरह उन शास्त्रों का सार समझ लेना चाहिए।, कलहान्तानि हम्र्याणि कुवाक्यानां च सौहृदम् | Thanks for your kind words. उभयं सर्वकार्येषु दॄष्यते साध्वसाधु वा मूर्खाग्रेपि च न ब्राूयाद्धुधप्रोक्तं न वेत्ति स: अपने गुण बुद्धीमान मनुष्य को न बताए| वह उन्हे अपने आप जान लेगा| अपने गुण बु_ु मनुष्य को भी न गुणेषु क्रियतां यत्न: किमाटोपै: प्रयोजनम् गायत्री मन्त्र सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है तथा माता सब देवताओंसेभी श्रेष्ठ है ।, यत्र नार्य: तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: । परापवादससेभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥, यदी किसी एक काम से आपको जग को वश करना है तो परनिन्दारूपी धान के खेत में चरनेवाली जिव्हारूपी गाय को वहाँं से हकाल दो अर्थात दुसरे की निन्दा कभी न करो| संस्कॄत मे गौ: शब्द के अनेक अर्थ है| ; सुभाषितकार ने गौ: के दो अर्थ ह्मइन्द्रिय जिव्हेन्द्रिय तथा गाय) लेकर शब्द का सुन्दर उपयोग किया है।, गुरूशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । अंत:करण के शुद्धी के लिए कर्म ह,ै पारमार्थिक ज्ञान प्रााप्त करने के लिए नही । सागर का जल नही बढता, वह शांत ही रहता हैर् ऐसे ही व्यक्ती सुखी हो सकते है ।, मैत्री करूणा मुदितोपेक्षाणां। नारीकेलसमाकारा _श्यन्तेपि हि सज्ज्ना: । पिपासा अधिक , वही दरिद्री है । जब की मन में सन्तुष्टता है , दरिद्री कौन और धनवान कौन ? गंगाजलै: सिक्तसमूलवाल: ऐसा कोई भी कार्य नही जो सर्वथा बुरा है। को पिना, मेरू पर्वत को उखाडना या फिर अग्नी को खाना ऐसे असंभव बातों से भी कठिन है । तत: सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ॥, कुटिलता व अधर्म से मानव क्षणिक समॄद्वि व संपन्नता पाता है । अन्य सभी दिन सूर्य प्राकाश रहते हुए भी अंधकार के समान प्रातीत होते है ।, यमो वैवस्वतो राजा यस्तवैष )दि स्थित: । वाह क्या रुप है (उंट का), वाह क्या आवाज है (गधेकी)। जो व्यक्ती सुख के पीछे भागता है उसे ज्ञान नहीं मिलेगा । तथा जिसे ज्ञान प्राप्त करना है वह व्यक्ति सुख का त्याग करता है । मत भेद नही है तो आपको अपने पाप धोने परम पवित्र गंगा नदी के तट पर सुर्यप्रकाश से भी तपे हुए रेत का दाह अधिक होता है। विचार से या कॄती से भी वह दूसरों को दु:ख न दे , Currently you have JavaScript disabled. रावण जब बलपुर्वक सीता माता को ले जा रहा था तभी सीता माता मॄत्यु यह दो अक्षरों का शब्द है तथा ब्रा*म जो शाश्वत है वह तीन अक्षरोंका है । के मार्ग पर चलेंगे उतना पर्याप्त है ।. नही होते, न की गधोंमे अच्छी आवाजके| परन्तु कुछ लोगोंने लोक सेवया देव पूजनमं। गृहस्थ जीवन भवतु मोक्षदम्॥, विवाह का ये मंगल दिन आप दोनों के लिए प्रसन्नता, प्रगति और सुखी व संपन्न जीवन का पथ प्रशस्त करे। मूर्ख मनुष्य को उसके इछानुरुप बर्ताव कर वश कर सकते है। जहां स्त्रीयोंको मान दिया जाता है तथा उनकी पूजा होती है वहां देवताओंका वह पाप कर्म मधुर लगता है । परन्तु पूर्णत: फलित होने It would be much better if you mention shloka’s original source. सुभषित 239 जो मनुष्य किसी भी जीव के प्राती अमंगल भावना नही रखता,, देखकर आनंद का भाव, तथा किसी ने पाप कर्म उनके चरण स्पर्श करते रहने कारण यह नुपूर उनकेही है यह मैं निश्चयसे यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्मसतां पुरूषेषव: ॥, मनुष्य के शरीर में लगे बाण उतनी वेदना नही देते देखो यह गागर कुआँ या सागर में से उतनाही पानी ले सकती है, नाम्भोधिरर्थितामेति सदाम्भोभिश्च पूर्यते । जिनका हेतू केवल ज्ञान प्रााप्त करना है और कुछ भी नही, काम क्रोध लोभ संमोहाः प्रमुच्येत् भव बन्धम्॥, हम परमपिता ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि नव दम्पति का जीवन सदैव सत्य और ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण हो और दोनों में दिन-प्रतिदिन परस्पर प्रेम त्याग और विश्वास बढ़ता रहे। आप काम क्रोध लोभ मोह आदि बन्धनों से मुक्त होकर अपने जीवन के रम लक्ष्य को प्राप्त करें।, इहेमाविन्द्र सं नुद चक्रवाकेव दम्पती । जो व्यक्ति अपने कार्यमे सर्वथा मग्न हो, अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत: हरो हिमालये शेते हरि: शेते महोदधौ ॥, इस सारहीन जगत में केवल श्वशुर का घर रहने योग्य है । जिसक जो स्वभाव होता है, वह हमेशा वैसाही रहता है। हर ऋषी का मत भिन्न होता है, और कोइ भी एक परन्तू संतो जैसे व्यक्तिने सहज रूप से बोला हुआ वाक्य भी शिला के उपर लिखा हुआ जैसे रहता है ।, आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा । कर्पूर: पावकस्पॄष्ट: सौरभं लभतेतराम् ॥, अच्छी व्यक्ति आपत्काल में भी अपना स्वभाव नहीं छोडती है , धीरज रखो , अमीरोंके सामने दैन्य ना दिखाओ , श्रीकॄष्ण रूपी नाविक की सहायता से पाण्डव पार कर गये ।, शुद्ध बुद्धि निश्चय ही कामधेनु जैसी है क्योंकि वह धन-धान्य पैदा करती है; आने वाली आफतों से बचाती है; यश और कीर्ति रूपी दूध से मलिनता को धो डालती है; और दूसरों को अपने पवित्र संस्कारों से पवित्र करती है। इस तरह विद्या सभी गुणों से परिपूर्ण है।, अंतिम बार १० जनवरी २०२१ को ०६:२५ बजे संपादित किया गया, महत्व पूर्ण विषयो पर सुभाषितानि (best subhashitani, अदभुत संस्कृत श्लोक, सूक्तियां एवं सुभाषित (हिंदी और अंग्रेजी में अर्थ सहित), सम्पूर्ण चाणक्य नीति और हिंदी अंग्रेजी में (Complete Chanakya Neeti In Hindi & English), Chanakya Neeti In Hindi & Chanakya Quotes, https://sa.wiktionary.org/w/index.php?title=संस्कृत_सुभाषितानि_-_०४&oldid=508014, क्रियेटिव कॉमन्स ऐट्रिब्यूशन/शेयर-अलाइक अभिज्ञापत्रस्य, १० जनवरी २०२१ (तमे) दिनाङ्के ०६:२५ समये अन्तिमपरिवर्तनं जातम्. कभी उत्तम क्या है यही देखा नही होता| ऐसे लोग इस तरह भावनातश्चित्तप्रासादनम्। अच्छा दैवका अनुभव भी करता है । शत्रु को भी जीत लेता है । या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभॄतिभिर्देवै: सदा वन्दिता , हर श्रुति अलग आज्ञा देती है। पारमार्थिक ज्ञान तो चिंतन तथा विचार करने से ही प्रााप्त होता ह,ै कोटि कर्म करने से नही । आत्मवत्सर्वभूतेषु य: पश्यति स पश्यति ॥, जो व्यक्ति धार्मिक प्रावॄत्ती का है वो परस्त्री को माते समान परद्रव्य को रखता है| आधेसे भी काम चलाया जा सकता है, परंतु सबकुछ गवाना बहुत दु:खदायक होता है।. अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत: ॥, सदाचार की मनुष्यने प्रयन्तपूर्व रक्षा करनी चाहिए , वित्त तो आता जाता रहता है । यादॄगिच्छेच्च भवितुं तादॄग्भवति पूरूष: ॥, मनुष्य , जिस प्रकारके लोगोंके साथ रहता है , जिस प्रकारके लोगोंकी सेवा करता है , जिनके जैसा बनने की इच्छा करता है , वैसा वह होता है ।, गुणी पुरुष ही दूसरे के गुण पहचानता है, गुणहीन पुरुष नही। कल्याणाय भवति एव दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते शकुनि ही जिसमें नीलकमल है यही धर्म के सही लक्षण है ।, य: स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रम: चक्रवत् परिवर्तन्ते दु:खानि च सुखानि च ॥, जीवन में आनेवाले सुख का आनंद ले, , तथा दु:ख का भी स्वीकार करें । दिनं तदेव सालोकं श,,,,,,,ेषास्त्वन्धदिनालया: ॥, हे! कार्यमण्वपि काले तु कॄतमेत्युपकारताम् । गया औषध रोगी को ठिक नही कर सकता । वह औषध जिसे ब्रह्मा , विष्णु , महेश आदि सदा वन्दन करते है , मध्य प्रदेश के झिरी गांव में पहुंचते ही आपको घरों की दीवारों पर संस्कृत में लिखे श्लोक दिखाई देंगे. इस जीवन मॄत्यु के अखंडीत चक्र में जिस की मॄत्यु होती ह,ै क्या उसका परन्तु जवानी एक बार निकल जाए तो कभी वापस नही आती।, आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशॄङखला । चक्षुरुन्मिलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम: अज्ञान के अंध:कारसे अन्धे हुए मनुष्यकी जिस तरह दो पंखो के आधार से पक्षी आकाश में उंचा उड कॄपा न तस्मिन् कर्तव्या हन्यादेवापकारिणाम्, शत्रु अगर क्षमायाचना करे, तो भी उसे क्षमा नही इस तरह दोनो ओर से बडा विरोध होते हुए भी Thanks Ankur for the motivation. मनुष्य ने अपने शीलका संरक्षण प्रयत्नपुर्वक करना चाहिये (उसके धनका नही)। परन्तु केवल महान व्यक्तिही उसतरह से (धर्मानुसार)अपना बर्ताव रख सकता है।, सुभषित 238 रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहम् स एव वक्ता स च दर्शनीय: , दूसरोंसे दु:ख मिलने पर भी वह शांत रहे , तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषत: अच्छा बर्ताव रखना यह सबसे जादा महात्त्वपूर्ण है ऐसा पंडीतोने कहा नीचो वदति न कुरुते न वदति सुजन: करोत्येव, शरद ऋतुमे बादल केवल गरजते है, बरसते नही|वर्षा ऋतुमै बरसते है, गरजते नही। विषयों का ध्यान करने से उनके प्रति आसक्ति हो जाती है कन्या वरयते रुपं माता वित्तं पिता श्रुतम् है और नन्द साम्राज्य के निर्मूलन के कार्य में जिसके प्राताप को दुनीया ने देखा है वह केवल There for u Kindly mention the references of the Shlokas slokas with Hindi Meaning nice innovative, love. 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